कोई चंचलता नहीं
शांत है सब
इतना शांत कि
कुछ बिलस्त मुस्काने उग आईं हैं देखो
मन के किनारे
एक बहती नदी सा हो चला है
कभी चंचल था
बच्चे सा कूदता
अल्हध जवान सा फिरता
पर बूढ़ा नहीं हुआ है
बस लौट आया है
वहीँ
जहाँ से उपजा था
फूटा था एक कोपल से
या शायद फूट रहा है
जैसे बसंत के शाम की
हवा हो कोई
धीमी ..मध्यम ..शांत
हाँ ...लौट आया है मन
जहाँ से उपजा था ...
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