बड़ी देर तक अपने बिस्तर पर लेटी वो अपने कमरे की छत , हल्का सा चलता पंखा और उन् चार दीवारों को देखती रही ...उसके अपने थे वो,,उसके हमराज,, सब कुछ तो जानते थे ,,,पूरे दिन के बाद उस हकीकत की दुनिया से जब वो अपनी इस छोटी सी दुनिया में कदम रखती तो ये सपनो की दुनिया के ये दोस्त उसे अपने आगोश में ले लेते ,,,जैसे माँ की गोद ,,,जैसे एक प्रेमी का कंधा,,,जैसे एक दोस्त का दुलार,,कमरे की छत नहीं थी ये,,जैसे किसी बाप का हाथ था ऊपर ,,,
आते ही एक खुली किताब की तरह वो लेट जाती उस बिस्तर पर,,घंटों इन् अपनों से बातें करती,,कितनी अलग थी ये दुनिया,,उसकी अपनी,,सही मायनों में उसके अपनों की,,
एक दिन फिर उस बाहर की हकीकत की दुनिया के भूल्भुलैय्ये में खोने लगी वो,,,इंसान के बनाये रिश्तों की डोर में बंधती गयी,,,नाम,शौहरत,,पैसा,,,जैसे एक चुम्भाक था और वो एक चलता फिरता साँसे लेता लोहे का टुकड़ा,,,खिंच रही थी उनकी ओर ,,,और उसके वो अपने?? बस राह तकते थे,,दिनों दिन अब तो लौटती भी नहीं थी,,वो कमरा ,,,वो सब भूढ़े हो चले थे ,,आस लगाये बस इंतज़ार करते,,,
आज बहुत थक गयी थी ,,,फिर से लौटना चाहती थी,,एक अरसे बाद,,,अपनी दुनिया में,,
आकर देखा तो अब वो दीवारें भूढ़ी हो गयीं थीं ,,,सीलन की झुर्रियां लिए पर वो अब भी इंतज़ार में थे ...किसी कोने से पानी ऐसे रिस रहा था मानो सूखी हड्डियों को किसी ने निचोड़ दिया हो,,
फिर से उन्हें वो सब कुछ कहना चाहती थी ..बातें करना चाहती थी,,,एक खुली किताब की तरह,,,पर अब शायद उन् भूढ़े कानों में सुनना बंद हो गया था।।।।
:) jab bhi Mummy ke ghar jata hun, aisa hi kuchh feel karta hun :)... keep writing :)
ReplyDeleteThanks Afroz :) Jaldi Jaldi jaya karo...:)
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